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जापानी रेड डायमंड अमरूद की खेती करना किसानों के लिए क्यों लाभकारी है

जापानी रेड डायमंड अमरूद की खेती करना किसानों के लिए क्यों लाभकारी है

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि जापानी रेड डायमंड अमरूद अंदर से दिखने में सुर्ख लाल होता है। यह देसी अमरूद की तुलना में काफी महंगा बिकता है। बाजार में इसका भाव हमेशा 100 से 150 रुपये किलो के मध्य ही रहता है। अगर आप इसकी खेती करते हैं, तो आपकी कमाई तीन गुना बढ़ जाएगी। इस किस्म के अमरुद की खेती करने पर निश्चित रूप से मुनाफा हांसिल होगा। दरअसल, लोगों को अमरुद का सेवन करना बेहद पसंद होता है। बाजार में अमरुद की मांग हमेशा बनी रहती है। अमरुद एक प्रकार से पोषक तत्वों का भंडार होता है। किसानों को अत्यधिक मुनाफा हांसिल करने के लिए भी वैज्ञानिक अमरुद की खेती करने की सलाह देते हैं। दरअसल, अमरुद के अंदर विभिन्न विटामिन्स पाए जाते हैं। परंतु, इसमें सबसे ज्यादा विटामिन सी की मात्रा पाई जाती है। इसके अतिरिक्त अमरूद में लोहा, चूना एवं फास्फोरस भी भरपूर मात्रा में उपस्थित होते हैं। यदि आप नियमित तौर पर अमरूद का सेवन करते हैं, तो आपका शरीर तंदरुस्त एवं तरोताजा रहेगा। दरअसल, भारत के अंदर अमरूद की विभिन्न किस्मों की खेती की जाती है। परंतु, आज हम एक ऐसे किस्म के विषय में बात करने वाले हैं, जिसकी खेती से किसान कुछ ही दिनों में धनवान हो जाएंगे।

जापानी रेड डायमंड अमरुद की कीमत

भारत में सामान्यतः अमरूद 40 से 60 रुपये किलो बिकता है। परंतु, जापानी रेड डायमंड अमरूद की एक ऐसी किस्म है, जिसका भाव काफी अधिक होता है। यह अपने स्वाद एवं मिठास के लिए जाना जाता है। बाजार में यह 100 से 150 रुपये किलो बिकता है। इसकी खेती करने वाले किसान कुछ ही वर्षों में धनवान हो जाते हैं। मुख्य बात यह है, कि बहुत सारे राज्यों में किसानों ने जापानी रेड डायमंड अमरूद की खेती की शुरुआत भी कर दी है।

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जापानी रेड डायमंड अमरुद की खेती के लिए मृदा एवं तापमान

जापानी रेड डायमंड अमरुद की खेती के लिए 10 डिग्री सेल्सियस से 42 डिग्री सेल्सियस के मध्य का तापमान उपयुक्त माना गया है। इसकी खेती के लिए मृदा का पीएच मान 7 से 8 के मध्य होना चाहिए। यदि आप काली एवं बलुई दोमट मृदा में जापानी रेड डायमंड अमरूद की खेती करते हैं, तो आपको काफी बेहतरीन उत्पादन मिलेगा। मुख्य बात यह है, कि खेत में जापानी डायमंड की बुवाई करते वक्त कतार से कतार के मध्य का फासला 8 फीट होनी चाहिए। वहीं, पौधों से पौधों के बीच का फासला 6 फीट रखना चाहिए। इससे पौधों का तीव्रता से विकास होता है। साथ ही, वर्ष में दो बार पौधों की छटाई भी करनी चाहिए।

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जापानी रेड डायमंड अमरुद की खेती से वार्षिक आय

दरअसल, बाकी फसलों की भांति जापानी रेड डायमंड अमरूद के खेत में उर्वरक के तौर पर गोबर एवं वर्मी कंपोस्ट का इस्तेमाल करें। इससे जमीन की उर्वरक शक्ति भी काफी बढ़ जाती है। यदि आप चाहें, तो एनपीके सल्फर, कैल्शियम नाइट्रेट, मैग्नीशियम सल्फर एवं बोरान का खाद के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं। साथ ही, पौधों को पानी देने के लिए ड्रिप सिंचाई का ही इस्तेमाल करें, इससे पानी की खपत काफी कम होती है। यदि आप देशी अमरूद की खेती से वर्ष में एक लाख रुपये कमा पा रहे हैं, तो जापानी रेड डायमंड अमरूद की खेती से आपकी कमाई तीन गुना तक बढ़ जाएगी। इसका अर्थ यह है, कि आप साल में 3 लाख रुपये की आय करेंगे।
अमरूद की खेती से जुड़ी विस्तृत जानकारी

अमरूद की खेती से जुड़ी विस्तृत जानकारी

भारत के अंदर अमरूद की फसल आम, केला और नीबू के बाद चौथे स्थान पर आने वाली व्यावसायिक फसल है। भारत में अमरुद की खेती की शुरुआत 17वीं शताब्दी से हुई। अमेरिका और वेस्ट इंडीज के उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र अमरुद की उत्पत्ति के लिए जाने जाते हैं। अमरूद भारत की जलवायु में इतना घुल मिल गया है, कि इसकी खेती बेहद सफलतापूर्वक की जाती है। 

वर्तमान में महाराष्ट्र, कर्नाटक, उड़ीसा, पश्चिमी बंगाल, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडू, बिहार और  उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त इसकी खेती पंजाब और हरियाणा में भी की जा रही है। पंजाब में 8022 हेक्टेयर के भू-भाग परअमरूद की खेती की जाती है और औसतन पैदावार 160463 मीट्रिक टन है। इसके साथ ही भारत की जलवायु में उत्पादित अमरूदों की मांग विदेशों में निरंतर बढ़ती जा रही है, जिसके चलते इसकी खेती व्यापारिक रूप से संपूर्ण भारत में भी होने लगी है।

अमरूद का स्वाद और पोषक तत्व

अमरुद का स्वाद खाने में ज्यादा स्वादिष्ट और मीठा होता है। अमरुद के अंदर विभिन्न औषधीय गुण भी विघमान होते हैं। इस वजह से इसका इस्तेमाल दातों से संबंधी रोगों से निजात पाने के लिए भी किया जाता है। बागवानी में अमरूद का अपना एक अलग ही महत्व है। अमरूद फायदेमंद, सस्ता और हर जगह मिलने की वजह से इसे गरीबों का सेब भी कहा जाता है। अमरुद के अंदर विटामिन सी, विटामिन बी, कैल्शियम, आयरन और फास्फोरस जैसे पोषक तत्व विघमान होते हैं।

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अमरुद से कितना लाभ अर्जित होता है

अमरुद से जेली, जूस, जैम और बर्फी भी बनायीं जाती हैं। अमरुद के फल की अच्छे से देख-रेख कर इसको ज्यादा समय तक भंडारित किया जा सकता है। किसान भाई अमरुद की एक बार बागवानी कर तकरीबन 30 साल तक उत्पादन उठा सकते हैं। किसान एक एकड़ में अमरूद की बागवानी से 10 से 12 लाख रूपए वार्षिक आय सुगमता से कर सकते हैं। यदि आप भी अमरूद की बागवानी करने का मन बना रहे हैं तो यह लेख आपके लिए अत्यंत लाभकारी है। क्योंकि, हम इस लेख में आपको अमरुद की खेती के बारे में जानकारी देंगे।

अमरूद की व्यापारिक उन्नत किस्में 

पंजाब पिंक: इस किस्म के फल बड़े आकार और आकर्षक सुनहरी पीला रंग के होते हैं। इसका गुद्दा लाल रंग का होता है, जिसमें से काफी अच्छी सुगंध आती है। इसके एक पौधा का उत्पादन वार्षिक तकरीबन 155 किलोग्राम तक होता है।

इलाहाबाद सफेदा: इसका फल नर्म और गोल आकार का होता है। इसके गुद्दे का रंग सफेद होता है, जिस में से आकर्षक सुगंध आती है। एक पौधा से तकरीबन सालाना पैदावार 80 से 100 किलोग्राम हो सकती है।

ओर्क्स मृदुला: इसके फल बड़े आकार के, नर्म, गोल और सफेद गुद्दे वाले होते हैं। इसके एक पौधे से वार्षिक 144 किलोग्राम तक फल हांसिल हो जाते हैं।

सरदार:  इसे एल 49 के नाम से भी जाना जाता है। इसका फल बड़े आकार और बाहर से खुरदुरा जैसा होता है। इसका गुद्दा क्रीम रंग का होता है। इसका प्रति पौधा वार्षिक उत्पादन 130 से 155 किलोग्राम तक होती है।

श्वेता: इस किस्म के फल का गुद्दा क्रीमी सफेद रंग का होता है। फल में सुक्रॉस की मात्रा 10.5 से 11.0 फीसद होती है। इसकी औसतन पैदावार 151 किलो प्रति वृक्ष होती है। 

पंजाब सफेदा: इस किस्म के फल का गुद्दा क्रीमी और सफेद होता है। फल में शुगर की मात्रा 13.4% प्रतिशत होती है और खट्टेपन की मात्रा 0.62 प्रतिशत होती है।

अन्य उन्नत किस्में: इलाहाबाद सुरखा, सेब अमरूद, चित्तीदार, पंत प्रभात, ललित इत्यादि अमरूद की उन्नत व्यापारिक किस्में है। इन सभी किस्मों में टीएसएस की मात्रा इलाहबाद सफेदा और एल 49 किस्म से ज्यादा होती है। 

अमरूद की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु 

भारतीय जलवायु में अमरूद इस तरह से घुल मिल गया है, कि इसकी खेती भारत के किसी भी हिस्से में अत्यंत सफलतापूर्वक सुगमता से की जा सकती है। अमरूद का पौधा ज्यादा सहिष्णु होने की वजह इसकी खेती किसी भी प्रकार की मिट्टी एवं जलवायु में बड़ी ही आसानी से की जा सकती है। अमरुद का पौधा उष्ण कटिबंधीय जलवायु वाला होता है।

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इसलिए इसकी खेती सबसे अधिक शुष्क और अर्ध शुष्क जलवायु वाले क्षेत्रों में की जाती है। अमरुद के पौधे सर्द और गर्म दोनों ही जलवायु को आसानी से सहन कर लेते हैं। किन्तु सर्दियों के मौसम में गिरने वाला पाला इसके छोटे पौधों को नुकसान पहुंचाता है। इसके पौधे अधिकतम 30 डिग्री तथा न्यूनतम 15 डिग्री तापमान को ही सहन कर सकते है। वहीं, पूर्ण विकसित पौधा 44 डिग्री तक के तापमान को भी सहन कर सकता है।

खेती के लिए भूमि का चुनाव

जैसा कि उपरोक्त में आपको बताया कि अमरूद का पौधा उष्ण कटिबंधीय जलवायु का पौधा हैं। भारतीय जलवायु के अनुसार इसकी खेती हल्की से भारी और कम जल निकासी वाली किसी भी तरह की मृदा में सफलतापूर्वक की जा सकती है। परंतु, इसकी बेहतरीन व्यापारिक खेती के लिए बलुई दोमट से चिकनी मिट्टी को सबसे अच्छा माना जाता है। क्षारीय मृदा में इसके पौधों पर उकठा रोग लगने का संकट होता है। 

इस वजह से इसकी खेती में भूमि का पी.एच मान 6 से 6.5 के बीच होना चाहिए। इसकी शानदार पैदावार लेने के लिए इसी तरह की मिट्टी के खेत का ही इस्तेमाल करें। अमरूद की बागवानी गर्म एवं शुष्क दोनों जलवायु में की जा सकती है। देश के जिन इलाकों में एक साल के अंदर 100 से 200 सेमी वर्षा होती है। वहां इसकी आसानी से सफलतापूर्वक खेती की जा सकती है।

अमरूद के बीजों की बुवाई की प्रक्रिया

अमरूद की खेती के लिए बीजों की बुवाई फरवरी से मार्च या अगस्त से सितंबर के महीने में करना सही है। अमरुद के पौधों की रोपाई बीज और पौध दोनों ही तरीकों से की जाती है। खेत में बीजों की बुवाई के अतिरिक्त पौध रोपाई से शीघ्र उत्पादन हांसिल किया जा सकता है। यदि अमरुद के खेत में पौध रोपाई करते हैं, तो इसमें पौधरोपण के वक्त 6 x 5 मीटर की दूरी रखें। अगर पौध को वर्गाकार ढ़ंग से लगाया गया है, तो इसके पौध की दूरी 15 से 20 फीट तक रखें। पौध की 25 से.मी. की गहराई पर रोपाई करें। 

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इससे पौधों और उसकी शाखाओं को फैलने के लिए काफी अच्छी जगह मिल जायेगी। अमरूद के एक एकड़ खेत वाली भूमि में तकरीबन 132 पौधे लगाए जा सकते हैं। इसके अतिरिक्त यदि इसकी खेती की बुवाई बीजों के जरिए से कर रहे हैं, तो फासला पौध रोपाई के मुताबिक ही होगा और बीजों को सामान्य गहराई में बोना चाहिए।

बिजाई का ढंग - खेत में रोपण करके, कलम लगाकर, पनीरी लगाकर, सीधी बिजाई करके इत्यादि तरीके से बिजाई कर सकते हैं।

अमरूद के बीजों से पौध तैयार (प्रजनन) करने की क्या प्रक्रिया है  

चयनित प्रजनन में अमरूद की परंपरागत फसल का इस्तेमाल किया जाता है। फलों की शानदार उपज और गुणवत्ता के लिए इसे इस्तेमाल में ला सकते हैं। पन्त प्रभात, लखनऊ-49, इलाहाबाद सुर्ख, पलुमा और अर्का मिरदुला आदि इसी तरह से विकसित की गई है। इसके पौधे बीज लगाकर या एयर लेयरिंग विधि द्वारा तेयार किए जाते हैं। सरदार किस्म के बीज सूखे को सहने लायक होते हैं और इन्हें जड़ों द्वारा पनीरी तैयार करने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। इसके लिए पूर्णतय पके हुए फलों में से बीज तैयार करके उन्हें बैड या नर्म क्यारियों में अगस्त से मार्च के माह में बिजाई करनी चाहिए। 

बतादें, कि क्यारियों की लंबाई 2 मीटर और चौड़ाई 1 मीटर तक होनी चाहिए। बिजाई से 6 महीने के पश्चात पनीरी खेत में लगाने के लिए तैयार हो जाती है। नवीन अंकुरित पनीरी की चौड़ाई 1 से 1.2 सेंटीमीटर और ऊंचाई 15 सेंटीमीटर तक हो जाने पर यह अंकुरन विधि के लिए इस्तेमाल करने के लिए तैयार हो जाती है। मई से जून तक का वक्त कलम विधि के लिए उपयुक्त होता है। नवीन पौधे और ताजी कटी टहनियों या कलमें अंकुरन विधि के लिए उपयोग की जा सकती हैं।

अमरूद की इन बेहतरीन किस्मों से किसान प्रतिवर्ष लाखों की आय कर सकते हैं

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आपकी जानकारी के लिए बतादें कि अमरूद एक ऐसी फसल है, जिसका उत्पादन किसी भी प्रकार की जलवायु में किया जा सकता है। यह 5 डिग्री से लेकर 45 डिग्री तक के तापमान को सहन करने में सक्षम है। अमरूद का सेवन करना सभी लोगों को काफी पसंद है। यह एक ऊर्जावान फल है। यह मिनरल्स और विटामिन से भरपूर है। सर्दी के मौसम में लोग इसका सेवन बड़े ही चाव से करते हैं। इसके अंदर भरपूर मात्रा में फाइबर भी विघमान रहता है। अमरूद का सेवन करने से कब्ज की बीमारी बिल्कुल सही हो जाती है। अच्छे एवं ताजे अमरूद का भाव सदैव 60 से 80 रुपये प्रतिकिलो होता है। अब ऐसी स्थिति में यदि किसान भाई अमरूद का उत्पादन करते हैं, तो उनकी आमदनी में काफी इजाफा हो सकता है।

अमरुद की कुछ बेहतरीन किस्में

अमरूद की फसल एक बागवानी फसलों के अंतर्गत आती है। अमरुद की खेती हर एक तरह की मृदा में की जा सकती है। एक हेक्टेयर में अमरूद की खेती करने पर किसान वर्ष भर में 24 लाख रुपये की आमदनी कर सकते हैं। इसमें 14 से 15 लाख रुपये का मुनाफा होगा। विशेष बात यह है, कि अमरूद की खेती की शुरूआत करने से पूर्व किसानों को इसकी बेहतरीन प्रजातियों के विषय में जानना होगा। यदि किसान भाई, बाग में अच्छी किस्म के पौधे नहीं रोपेंगे, तो निश्चित रूप से पैदावार प्रभावित होने की संभावना रहती है। हिसार सुर्खा, सफेद जैम,अर्का अमुलिया और वीएनआर बिही अमरूद की अच्छी किस्में हैं। इसके अतिरिक्त चित्तीदार, इलाहाबाद सफेदा, लखनऊ-49 भी अमरूद की शानदार किस्में हैं। ये भी पढ़े: जापानी रेड डायमंड अमरूद से किसान सामान्य अमरुद की तुलना में 3 गुना अधिक आय कर सकते हैं

अमरुद के पौधे हमेशा एक पंक्ति में 8 फीट की दूरी पर ही लगाएं

अमरूद बागवानी के अंतर्गत आने वाली एक ऐसी फसल है, जिसकी खेती हर तरह की जलवायु में की जा सकती है। यह 5 डिग्री से लेकर 45 डिग्री तक तापमान को सह सकता है। इस वजह से किसान पूरे भारत में इसका उत्पादन कर सकते हैं। एक बार खेती आरंभ करने पर किसान कई वर्षों तक मुनाफा कमा सकेंगे। अमरूद के पौधों को सदैव एक पंक्ति में 8 फीट की दूरी पर ही लगाएं। इससे पौधों को भरपूर मात्रा में धूप, हवा और पानी मिलते हैं, जिससे फसल का काफी अच्छा विकास होता है। दो पंक्तियों के मध्य 10 से 12 फीट की दूरी भी होनी चाहिए। ऐसे में आपको पौधे के ऊपर कीटनाशकों का छिड़काव करने में किसी भी प्रकार की दिक्कत नहीं आएगी। साथ ही, फल की तुड़ाई करना भी काफी सुगम हो जाएगा।

एक हेक्टेयर भूमि में 1200 अमरूद के प्लांट स्थापित किए जा सकते हैं

किसान भाई एक हेक्टेयर में 1200 अमरूद के प्लांट स्थापित कर सकता है। 2 साल के उपरांत अमरूद के बाग में फल आने चालू हो जाएंगे। इस दौरान रोपाई से लेकर पौधों के रख-रखाव पर लगभग 10 लाख की लागत आएगी। साथ ही, 2 साल के उपरांत एक सीजन में एक पेड़ से आप लगभग 20 किलो तक अमरूद तोड़ सकते हैं। इस प्रकार आप 1200 अमरूद के पौधों से एक सीजन में 24000 किलो अमरूद अर्जित कर सकते हैं।

किसान इस तरह अमरूद की खेती से 24 लाख तक की आमदनी कर सकते हैं

बाजार में अमरूद 60 से 80 रुपये प्रतिकिलो के हिसाब से बिकता है। अगर आप 50 रुपये किलो के हिसाब से भी अमरूद बेचते हैं, तो 24000 किलो अमरूद का भाव लगभग 12 लाख रुपए हो जाएगा। आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि अमरूद का पेड़ वर्ष में दो बार फल प्रदान करता है। इस प्रकार आप अरूद की खेती से 24 लाख तक की आमदनी कर सकते हैं।
अमरूद की इन किस्मों की करें खेती, होगी बम्पर कमाई

अमरूद की इन किस्मों की करें खेती, होगी बम्पर कमाई

भारत में अमरूद एक पसंदीदा फल है। जिसे लोग बेहद चाव के साथ खाते हैं। यह मिनरल्स औऱ विटामिन से भरपूर होता है। इसकी पैदावार मुख्यतः सर्दियों के मौसम में होती है, लेकिन अब ऐसी किस्में में आ गई हैं जिससे बाजार में हर मौसम में अमरूद उपलब्ध होता है। अमरूद में प्रचुर मात्रा में फाइबर पाया जाता है, जिससे लोग उत्तम स्वास्थ्य के लिए इस फल का सेवन करना पसंद करते हैं। बाजार में अमरूद के अच्छे खासे दाम मिल जाते हैं, ऐसे में किसान भाई अमरूद की खेती करके कम समय में ही अच्छी खासी कमाई कर सकते हैं। अमरूद एक बागवानी फसल है। इससे जैम, जैली, नेक्टर आदि परिरक्षित पदार्थ तैयार किये जाते है। इसकी पौष्टिकता को ध्यान मे रखते हुये लोग इसे गरीबों का सेब कहते हैं। यह स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभदायक होता है। इसमें विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।

अमरूद की खेती के लिए उपयुक्त जलवायु

अमरूद की खेती उष्ण कटीबंधीय और उपोष्ण-कटीबंधीय जलवायु में बेहद आसानी से की जा सकती है। उष्ण क्षेत्रों में तापमान व नमी की पर्याप्त मात्रा उपलब्धता रहती है, जिसके कारण अमरूद के पेड़ों पर साल भर फल लगते हैं और किसान भाई हर मौसम में अमरूद की फसल प्राप्त कर सकते हैं। अमरूद के पेड़ 44 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान बेहद आसानी से सहन कर सकते हैं। ज्यादा वर्षा वाले क्षेत्र अमरूद की खेती के लिए उपयुक्त नहीं माने गए हैं। ज्यादा वर्षा के कारण अमरूद के पौधे सड़ जाते हैं।

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इसकी खेती के लिए गर्म तथा शुष्क जलवायु सबसे अच्छी मानी जाती है। ज्यादा ठंड से कई बार अमरूद के पौधों पर नकारात्मक असर देखा गया है। कई बार भीषण ठंड में अमरूद के पौधों में पाला लग जाता है। इसके विपरीत अमरूद के पेड़ कड़ाके की ठंड भी झेल सकते हैं, बड़े पेड़ों पर ठंड का कोई खास असर नहीं होता है।

भूमि का चयन एवं तैयारी

अमरूद का पेड़ हर प्रकार की भूमि में आसानी से उग सकता है। लेकिन यदि बलुई दोमट मिट्टी में इसकी खेती की जाए तो इससे उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। अगर खेती के लिए बलुई दोमट मिट्टी का चयन किया गया है तो उसका पीएच मान 4.2 होना चाहिए। वहीं अगर अमरूद के पौधे लगाने के लिए चूनायुक्त भूमि का चुनाव किया गया है तो पीएच मान 8.2 होना चाहिए। खेत तैयार करने के पहले दो से तीन बार अच्छे से जुताई कर लें। इसके बाद खेत में 15 गाड़ी प्रति एकड़ के हिसाब से सड़ी हुई खाद या कंपोस्ट डालें। इसके बाद खेत में 2 फीट व्यास के 8-10 सेंटीमीटर गहरे गड्ढे तैयार कर लें। गड्ढों की दूरी 20 फीट होनी चाहिए।

अमरूद की उपलब्ध प्रजातियां और किस्में

बाजार में अमरूद की कई प्रजातियां उपलब्ध हैं, जिनकी खेती किसान भाई करते हैं। लेकिन इन दिनों  इलाहाबादी सफेदा, सरदार 49 लखनऊ, सेबनुमा अमरूद, इलाहाबादी सुरखा, बेहट कोकोनट आदि प्रजातियां किसानों की पहली पसंद हैं। इसके अलावा चित्तीदार, रेड फ्लेस्ड, ढोलका, नासिक धारदार आदि किस्मों की खेती भी बहुतायत में की जाती है।

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पौध रोपण

अमरूद की पौध को जुलाई और अगस्त में लगाया जाता है। इसके अलावा फरवरी मार्च में भी अमरूद के पौधे लगाए जा सकते हैं, लेकिन इसके लिए सिंचाई व्यवस्था उपलब्ध होना चाहिए। रोपाई के पहले गड्ढों को सड़ी हुई गोबर की खाद और आर्गनिक खाद से भर दें। इसके बाद गड्ढों में पानी डालें। जब पानी सूख जाए और गड्ढों की मिट्टी बैठ जाए तब पौधे को गड्ढे के बीचों बीच लगा दें और मिट्टी से अच्छी प्रकार से दबाकर सिंचाई कर दें।

पौधों की सिंचाई

अमरूद के पौधों में मौसम के हिसाब से सिंचाई की जाती है। गर्मियों के मौसम में 7 दिन के अंतराल में तथा सर्दियों के मौसम में 15 दिन के अंतराल में सिंचाई करना चाहिए। ध्यान रखें कि जरूरत से अधिक मात्रा में सिंचाई न करें, इससे पौधे सड़ सकते हैं।

खरपतवार नियंत्रण

अमरूद की खेती में खरपतवार नियंत्रण बेहद जरूरी है। खरपतवार पौधों के विकास को प्रभावित करते हैं। खरपतवार नियंत्रण के लिए समय-समय पर निराई गुड़ाई करते रहें। जब पेड़ बड़े हो जाएं तो बाग की जुताई कर दें। इससे खरपतवार पर नियंत्रण पाया जा सकेगा।

कीट एवं रोग नियंत्रण

अमरूद के पेड़ों पर कीट एवं बीमारियों का प्रकोप मुख्यतः बरसात के मौसम में होता है। इनसे पौधों तथा फलों की गुणवत्ता पर नकारात्मक असर दिखाई देता है। अमरूद के पेड़ों में छाल खाने वाले कीड़े, फल छेदक, फल में अंड़े देने वाली मक्खी, शाखा बेधक आदि कीट लगते हैं। इनके नियंत्रण के लिए जैविक कीटनाशक का प्रयोग कर सकते हैं। अगर तब भी कीटों का प्रकोप कम न हो तो पौधों को नष्ट कर दें। इसके अलावा अमरूद के पेड़ों पर उकठा रोग और तना कैंसर जैसे रोग लगते हैं। यह रोग भूमि में नमी होने के कारण फैलते हैं। इन रोगों के नियंत्रण के लिए ग्रसित डालियों को काटकर जाला देना चाहिए तथा कटे भाग पर ग्रीस लगा कर बंद कर देना चाहिए। इसके बाद भी अगर रोग से छुटकारा न मिले तो पौधे को तुरंत निकाल कर नष्ट कर देना चाहिए।

फलों की तुड़ाई और उपज

अमरूद के पेड़ों पर फूल आने के 120 दिन बाद फल आने से शुरू हो जाते हैं। जब फलों का रंग पीला पड़ने लगे तो तुड़ाई करके पेटियों में स्टोर कर लेना चाहिए। एक पेड़ से 150 किलो फल तक प्राप्त किया जा सकते हैं। यह फल जल्दी खराब हो जाते हैं, इसलिए इनकी तुड़ाई के बाद तुरंत मंडी में बेंचने के लिए भेज देना चाहिए। उत्तर और पूर्वी भारत मे साल में दो बार अमरूद की फसल प्राप्त होती है। जबकि पश्चिम व दक्षिणी भारत में साल में तीन बार अमरूद के फल प्राप्त किए जा सकते हैं।
अमरूद की खेती को बढ़ावा देने के लिए इस राज्य में मिल रहा 50 प्रतिशत अनुदान

अमरूद की खेती को बढ़ावा देने के लिए इस राज्य में मिल रहा 50 प्रतिशत अनुदान

बेगूसराय जनपद में किसान केला, नींबू, पपीता और आम की खेती काफी बड़े पैमाने पर करते हैं। परंतु, अमरूद की खेती करने वाले किसान भाइयों की तादात आज भी बहुत कम है। बिहार राज्य में किसान दलहन, तिलहन, धान और गेहूं के साथ-साथ बागवानी फसलों की भी बड़े पैमाने पर खेती करते हैं। दरभंगा, हाजीपुर, मुंगेर, मधुबनी, पटना, गया और नालंदा समेत तकरीबन समस्त जनपदों में किसान फल और सब्जियों का उत्पादन कर रहे हैं। विशेष कर इन जनपदों में किसान सेब, आलू, भिंडी, लौकी, आम, अमरूद, केला और लीची की खेती बड़े स्तर पर की जाती है। परंतु, वर्तमान में उद्यान विभाग द्वारा बेगूसराय जनपद में अमरूद का क्षेत्रफल बढ़ाने के लिए शानदार योजना तैयार की है। इस योजना के अंतर्गत अमरूद की खेती चालू करने वाले उत्पादकों को मोटा अनुदान दिया जाएगा।

केवल इतनी डिसमिल भूमि वाले किसान उठा पाएंगे लाभ

मीडिया एजेंसियों के अनुसार, मुख्यमंत्री बागवानी मिशन योजना के अंतर्गत बेगूसराय जनपद में अमरूद की खेती करने वाले किसान भाइयों को 50 प्रतिशत अनुदान दिया जाएगा। मुख्य बात यह है, कि इस योजना के अंतर्गत जनपद में 5 हेक्टेयर भूमि पर अमरूद की खेती की जाएगी। जिन किसान भाइयों के पास न्यूनतम 25 डिसमिल भूमि है, वह अनुदान का फायदा प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए कृषकों को कृषि विभाग की आधिकारिक वेवसाइट पर जाकर आवेदन करना पड़ेगा। यह भी पढ़ें: अब सरकार बागवानी फसलों के लिए देगी 50% तक की सब्सिडी, जानिए संपूर्ण ब्यौरा

अमरुद उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए 40 प्रतिशत अनुदान

बतादें, कि बेगूसराय जनपद में किसान केला,नींबू, पपीता और आम की बड़े स्तर पर खेती करते हैं। लेकिन, जनपद में अमरूद की खेती करने वाले कृषकों की तादात आज भी जनपद में बेहद कम होती है। यही कारण है, कि कृषि विभाग द्वारा मुख्यमंत्री बागवानी मिशन योजना के अंतर्गत जनपद में अमरूद की खेती का क्षेत्रफल में बढ़ोत्तरी करने की योजना बनाई और किसानों को 50 प्रतिशत अनुदान देने का फैसला लिया है। किसान रामचंद्र महतो ने कहा है, कि यदि सरकार अनुदान प्रदान करती है, तो वह अमरूद की खेती अवश्य करेंगे।

बेगूसराय में कितने अमरुद लगाने का लक्ष्य तय किया गया है

साथ ही, जिला उद्यान पदाधिकारी राजीव रंजन ने कहा है, कि सरदार अमरूद एवं इलाहाबादी सफेदा जैसी प्रजातियों के पौधे कृषकों को अनुदान पर मुहैय्या कराए जाऐंगे। उनका कहना है, कि अमरूद के बाग में 3×3 के फासले पर एक पौधा लगाया जाता है। यदि किसान भाई एक हेक्टेयर भूमि में खेती करेंगे तो उनको 1111 अमरूद के पौधे लगाने होंगे। साथ ही, बेगूसराय जनपद में 5555 अमरूद के पौधे लगाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।